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Astrology classes part 1 ज्योतिषिय तत्व सिद्धांत

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Astrology classes part 1 ज्योतिषिय तत्व सिद्धांत

भौम अर्थात मंगल :-

ज्योतिषीय दृष्टि में भौम को ऊर्जा का कारक माना गया हैं । प्राकृतिक स्तर से यदि देखा जाए तो आत्मा जो सूक्ष्म शरीर की सत्ता को प्राकृतिक स्तर पर निर्धारित करता हैं । तो वही पर शरीर भौतिक शरीर की सत्ता को निर्धारित करता हैं । किन्तु , इन दोनों के अस्तित्व का निर्धारण करने वाला श्रोत कौन होगा । इन दोनों के अस्तित्व को निर्धारित करने वाले सत्ता का आधार ऊर्जा ही होगा । यदि शरीर के किसी अंग की स्तिथि खराब हो तो उस अंग में ऊर्जा का संचयन कैसे होगा ये प्राकृतिक स्तर पर विचारणीय हैं । यदि राजा हैं रानी हैं और राज्य हैं प्रजा हैं सत्ता हैं प्रभाव हैं स्थिरता हैं या फिर किसी भी प्रकार का द्वंद हैं तो इन सभी तथ्यों का सामंजस्य और समन्वयता का माध्यम कौन हो सकता हैं क्योंकि , प्राकृतिक स्तर से बिना ऊर्जा के उपरोक्त तथ्यों के मध्य सामंजस्य और समन्वयता की स्तिथि कौन निर्धारित कर सकता हैं ? जब शरीर में किसी प्रकार का रोग परेशानी का कारण बनता हैं तो उस रोग की निवृति हेतु शरीर के द्वारा दिखाए जाने वाले पराक्रम की स्तिथि किस पर निर्धारित की जा सकती हैं । वो पराक्रम की स्तिथि को निर्धारित करने वाली ऊर्जा का यदि शरीर में लोप हो जाएँ तो शरीर द्वारा रोग को बढ़ावा देने वाले कारक की सत्ता उस भौतिक शरीर पर स्थापित हो जाएंगी और सूक्ष्म शरीर के सत्ता को भौतिक सत्ता से अलग कर देंगी । और आत्मा रूपी राजा , भावना रूपी रानी , अंग रूपी प्रजा , से निर्धारित शरीर रूपी राज्य का विनाश हो जाएगा । आत्मा का शरीर से अलग होना ही मृत्यु हैं जीवन का सार निर्धारित करने वाला पराक्रमी शरीर जो ऊर्जा के सामंजस्य से निर्धारित होता हैं । ऊर्जा विहीन तथ्य सिर्फ मृदा के रूप में स्थित हो करके ऊर्जा से परिपूर्ण  तथ्य के साथ ऊर्जा का संचालन करने हेतु प्राकृतिक स्तर से निर्धारित हो जाएंगी जिससे उस पूर्व कालिक सत्ता का राज्य का लोप हो जाता हैं । ऊर्जा के क्षय से न ही वो शरीर रूपी राज्य होता हैं , न ही उस शरीर के अंग रूपी प्रजा होते हैं , न ही अंग के संचालन कर्ता राज्य के प्रमुख गण होते हैं न ही शरीर की किसी भी प्रकार की भावना रूपी रानी होती हैं और न आत्मा रूपी राजा भावना रूपी रानी के साथ मिलकर शरीर रूपी राज्य का पालन व पोषण करती हैं ।

उपरोक्त तथ्यों की पूर्ति हेतु प्राकृतिक स्तर से ऊर्जा रूपी तथ्यों का निर्धारण ईश्वरीय सत्ता द्वारा निर्धारित किया गया हैं । प्रकृति द्वारा ऊर्जा हेतु कोई एक तत्व निश्चित नहीं हैं । यदि जन्म कुंडली में मेष और वृश्चिक राशि की स्तिथि ही देखी जाए तो ऊर्जा के लिए अग्नि व जल दोनों की अहमियत समान रूप से निश्चित हैं । आत्मा रूपी सत्ता का अस्तित्व निर्धारण करने वाला श्रोत्र अग्नि और भौतिक सत्ता को निर्धारित करने वाला श्रोत्र जल और दोनों के समायोजन से जीव रूपी सृष्टि और सृष्टि रूपी तथ्य का मूल आधार पाँच महाभूत अग्नि मृदा वायु जल और आकाश ( अमृदावायुसोमकाशः ) इन सभी में ऊर्जा रूपी यथार्थ का समन्वयता हो ही जाता हैं । इसी ऊर्जा रूपी तथ्य को महर्षियों द्वारा तंत्र ज्योतिष व प्राकृत रूप से व्यक्त करने हेतु भौम  अर्थात मंगल ग्रह से संबोधित किए हुए हैं । जिसके कारक तत्वों की व्याख्या आगे दी जा रही हैं ।

भौम अर्थात  मंगल  के कारक तत्व  उग्रता , क्रोध , शस्त्र , पराक्रम , उद्वेग , सेना , व सेनाध्यक्ष , कसाई , दुर्घटना, रक्तपात , प्रशासन , माँस , भुजा , बल , भूमि,  रक्षा-तंत्र , लड़ाई , मारकाट , भाई , भावनात्मक बल व आत्म बल रूपी साहस , रक्षक , द्वंद विनाशक,  स्थिरता , सामंजस्य , पुरुषार्थ के साथ साथ विस्फोटक , शल्य-चिकित्सा चूल्हा , भट्टी इंजिनियर , धातु कर्मी , लोहार , सोनार , जेनरेटेर , राज मिस्त्री , भूमि , पूल , सड़क , नगर परियोजना आधारित व्यवस्था , सुरक्षा , मिस्त्री , गरम खाद्य प्रदार्थ  इत्यादि जैसे तथ्य को मंगल से संबंधित विषय को  कारक तत्व के रुप में देखने चाहिए ।

उपरोक्त प्रमुख तत्व से संबंध रखने वाले सभी तथ्य, तत्व, आधार, को ज्योतिषीय व तांत्रिक क्रियाओ हेतु भौम से संबंधित लेने चाहिए । भौम का रूप मद्यम आकार का वज्र के सामान कठोर शरीर , कठोर हृदय , रक्त वर्ण नेत्र , क्रोधी स्वभाव वाला हैं । चमड़े पर लालिमा लिए हुए कठोर शरीर के साथ साथ थोड़े गंभीर और स्थिरता के साथ साथ चंचलता को दृश्य करता हैं । चेहरे की बनावट में विविधता होने के कारण सोम और सूर्य दोनों की झलक भौम में दिखती हैं । ऊर्जा देने वाला दाता हैं , जिस प्रकार एक माँ रूपी चंद्रमा अपने जैसे जीव को भौतिक दुनिया में लाने के लिए अपने शरीर की हर एक वस्तु से सिंचित करती हैं ठीक उसी प्रकार से मंगल रूपी तथ्य अपना बल प्रदान करके अपने साथ रहने वाले को ऊर्जा व सुरक्षा प्रदान करती हैं । किन्तु , ये निर्भर करता हैं की साथ में कौन हैं , जैसी संगत वैसी रंगत वाली बात मंगल के साथ हो जाती हैं । विशेष चर्चा आगामी कक्षा में  धन्यवाद ।।

पारा अर्थात बुध

पारा अर्थात बुध :-  बुध हमारी बौद्धिक क्षमता को परिलक्षित करने वाले ग्रह हैं । विचारों का प्रयोग अपनी ऊपरी छवि को निर्दिष्ट करने वाले कारक ग्रह के रूप में जाने जाते हैं । बुध को शरीर के ऊपरी परत ( चमड़े) के रूप में जाना जाता हैं । बुध ही है जो आपकी वाह्य छवि को निर्धारित करने में आपका सहयोग करते हैं । चाहे शारीरक हो या मानसिक या वैचारिक इन सभी तथ्यों के वाह्य पक्ष को बुध ही निर्दिष्ट करते हैं । प्रायोगिक स्तर पर यदि देखा जाएँ तो वो कौन सा ऐसा तथ्य हैं जो आपको वाह्य दुनिया से जोड़ने में और आपके परिचय का मूल कारण बनता हैं ! गौर से देखा व समझा जाए तो व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता ही उसके वाह्य परिचय का साधन बनता हैं । क्योंकि एक बुद्धिमान व्यक्ति अपने ज्ञान को अपनी वाणी के द्वारा यदि व्यक्त न करें तो आप ही बताइए न ऐसा कौन सा कारण हैं जो व्यक्ति की वास्तविक छवि को व्यक्त करे आखिरकर व्यक्ति की वाणी ही तो उसके परिचय का कारण बनता हैं। बुध वही वाणी हैं जो क्षमताओ को व्यक्त करने का माध्यम बनता हैं । कभी वाचिक कभी मानसिक और कभी क्रियात्मक स्तर पर व्यक्त करने का साधन व्यक्ति की वाणी ही तो बनती हैं । यदि कोई गूंगा व्यक्ति आपके सामने प्रत्यक्ष हो तो आप कैसे उसके मन के बातों को समझ पाओगे यदि आप उसके सांकेतिक भाषा को नहीं जानते । अर्थात एक ऐसा ज्ञान जो व्यक्ति को तार्किक स्तर पर संकेत चिन्ह प्रकार के भेद में अंतर करने का सामर्थ्य देने वाला बुध बेहद ही अहम होता हैं । क्योंकि एक शिक्षक व शिक्षार्थी जब तक तार्किक स्तर पर अपने बौद्धिक क्षमता का प्रयोग न करें तो तत्व के और उसके स्वयं के आत्म स्वरूप का  भौतिक स्वरूप का उसके अपने सामर्थ्य का पता कैसे चलेगा । योग सिद्धांत में भी तर्क का विशेष महत्व हैं । और व्यक्ति के अंदर तर्क करने का सामर्थ्य आखिरकर उसके बौद्धिक क्षमता पर ही तो निर्धारित होती हैं ।

पारा अर्थात  बुध के कारक तत्व  बुद्धि , वाणी , बुआ , बहन , समीकरण , गणित , ज्ञान , ज्योतिष , तांत्रिक , ज्ञानी , ब्राह्मण , लेखन , शास्त्री , वैध , मांत्रिक , संपादक , चमड़े इत्यादि जैसे तथ्य को पारा अर्थात बुध से संबंधित कारक तत्व के रूप में देखने चाहिए ।

ज्योतिष शास्त्र में बुध को द्वि-स्वाभाविक ग्रहों की श्रेणी में रखा गया हैं । लिंग के अनुसार बुध तो पुरुष ग्रह के श्रेणी में आते हैं किन्तु , स्वाभाविक स्तर पर स्त्रियोचित गुणों से परिपूर्ण हैं । बुध चंद्रमा के नाजायज पुत्र के रूप में भी जाने जाते है । पुरुष शरीर में स्त्रियोचित्त स्वभाव इसे द्वि-स्वाभाविक बनाते हैं । इसी लक्षण के कारण कई ज्योतिषविज्ञ और ज्योतिष विज्ञान के मर्मज्ञों के द्वारा न ही पुरुष की श्रेणी में बुध को रखते हैं और न ही स्त्री की श्रेणी में बुध को रखते हैं वे सभी इसे हिजरा समझते हैं । किन्तु , मेरे विचार से शास्त्रों के अनुसार ही अर्धनारीश्वर के रूप में ही बुध का परिचय करने चाहिए । गुण भाव चेतना के आधार पर बुद्धि तो समस्त अवस्थाओ में प्रत्यक्ष तौर पर एक जैसे ही कार्य करती हैं ।

बुध शरीर से कोमल हैं थोड़े से चंचल हैं खेलने वाले बच्चे किशोरावस्था और उसके पूर्व के अवस्था से परिलक्षित हैं । इसीलिए तो बुध को ज्योतिषियों ने और महर्षियों ने राजकुमार की संज्ञा दी हैं । हाँ बच्चे माँ से और स्त्री से जितनी जल्दी घुल मिल जाते हैं उतने जल्दी पुरुष से तो नहीं घुलते मिलते ! इस संज्ञात्मक स्तिथि को देखते हुए भी स्वाभाविक स्तर पर बुध को स्त्रियोचित्त स्वभाव वाला ही तो माना जाता हैं । प्रकृति का एक सिद्धांत हैं वो स्वयं के स्वभाव और गुणों के अनुसार अपना स्थान व स्तिथि को चुनती हैं । माँ अपने बच्चे की चंचल स्वभाव को जितनी जल्दी समझती हैं उतने तो पिता भी नहीं समझ पाते । क्योंकि , चंद्रमा स्वयं चंचल हैं स्वाभाविक तौर पर चंद्रमा भी तो किसी बच्चे से कम नहीं होती । इसी कारण से बुध की चंचलता माता चंद्रमा को बेहद प्रिय हैं । अन्य स्वरूप में और सूक्ष्मता से देखा जाएँ तो छोटे पौधे के समान दूर्वा की तरह थोड़े रूखे विचारों वाले किन्तु , कोमल ऐसा छवि जहाँ प्रयुक्त होता हैं और बाल्यावस्था से किशोरावस्था के मध्य के भाग की स्तिथि बुध ही तो हैं । शायद इसी रहस्य के कारण से चंद्रमा को अपना पुत्र बुध बहुत प्रिय हैं किन्तु , बुध को माता चंद्रमा की चंचलता तो पसंद आती हैं परंतु , भावनात्मक पहलू चंद्रमा की उसे रास नहीं आती । स्वाद की भी बात की जाए तो चंद्रमा को नमकीन पसंद हैं और बुध को चटपटा पसंद हैं । अर्थात इस संयोग से भी चंद्रमा और बुध की स्तिथि एक मत ही तो हैं  भला चटपटा स्वाद मीठे से संभव हैं ?आगे की और विस्तार से कक्षा में करेंगे कैसे हैं चंद्रमा के राजकुमार जी का स्वभाव ।  


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