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कुंडली मिलान जरूरी क्यों भाग २ विवाह हेतु कुंडली दोष परिहार

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कुंडली मिलान जरूरी क्यों भाग २ विवाह हेतु कुंडली दोष परिहार

Bhagalpur astrology & research center

ASTROLOGER :- MR. R.K. MISHRA CONTACT NUM:- 6202199681
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विवाह से संबंधित प्रश्नों के जबाब ( भाग २ )

विवाह से संबंधित दोष का परिहार व ज्योतिषीय उपाय ।।

कई जातक व जातिका के विवाह समयो-पूर्वांत व समयोपरांत व कुंडली मिलान के समय कुछ विशेष दोष को बताया जाता हैं । जिसके संदर्भित आज इस लेख के माध्यम से सम्पूर्ण दोषों के ज्योतिषीय परिहार पर विशेष चर्चा करने जा रहा हूँ । मेरी विनम्र अनुमोदन हैं की आप इस परिहार दोष के लेख को पढ़ने से पूर्व प्रथम लेख अर्थात भाग १ ( प्रथम भाग लिंक करें  ) को पढे ताकि विवाह से संबंधित दोष के परिहार के विषय में लिखी गई इस लेख को भलीभाँति आप समझ पाएं ।। इस लेख के माध्यम से कुंडली मिलान से संबंधित मामलों में प्रयुक्त दोष के परिहार व विवाहोपरांत ज्योतिषीय उपाय का उपयुक्त विवरण आप सभी विद्वत-जनों के समक्ष प्रस्तुत हैं ।  

परिहार संदर्भ १

गण दोष ग्रह दोष तथा भकुट दोष परिहार

ज्योतिषीय सुत्रानुसार  यदि दोनों ( वर व कन्या ) के राशि स्वामी की अथवा  नवांश के स्वामियों की परस्पर मित्रता हो तो गण-दोष , शुभ भकुट से ग्रह शत्रुता जन्य दोष तथा ग्रह मैत्री से भकुट के दोष नाश होते हैं ।।

परिहार संदर्भ २

दुष्ट भकुट दोष परिहार

यदि दुष्ट भकुट हो परञ्च ( परंतु ) राशि के स्वामी एक हो (अर्थात  मेष वृश्चिक का मंगल , वृषभ-तुला का शुक्र इत्यादि ) वा राशियो में परस्पर नैसर्गिक व स्वाभाविक मित्रता हो अथवा नाड़ी बेध न हो तो विवाह शुभ होता हैं । और षटकाष्टादि अर्थात चंद्रमा वर व बधू की कुंडली में एक दूसरे के राशि से छठे व आठवें भाव में हो तो उपरोक्त मंगल व शुक्र संबंधित राशि को छोड़कर अन्य राशियो में परस्पर राशियों की शत्रुता में यदि राशि के नवांशेशो में मैत्री हो , बलवान हो , अथवा नाड़ी और नक्षत्र शुद्ध हो तो विवाह शुभ शुभ हैं । तथा पुरुष राशि से स्त्री की राशि वश्य न भी हो किन्तु यदि वर-कन्या की परस्पर तारा , नाड़ी , और नक्षत्र शुद्धि हो तो द्विजो ( वर व वधू ) के मध्य विवाह करना शुभ कहा गया हैं ।

षटकाष्टादि सिद्धांत के अनुसार चंद्रमा आधारित स्तिथि यदि वर व वधू के राशि स्वामी से त्रिक स्थित चंद्रमा हो तो ऐसे में वर व वधू के मध्य शत्रुता व विच्छेदात्मक स्थिति को परिलक्षित करता हैं । किन्तु , ज्योतिष के आचार्यों के द्वारा इस सिद्धांत का खंडन भी किया गया जैसे की मंगल की स्तिथि व शुक्र की स्तिथि मंगल व शुक्र ग्रह दो राशि-पति हैं जिसमे मंगल मेष राशि व वृश्चिक राशि के स्वामी हैं दोनों अलग अलग तत्व की राशि हैं एक अग्नि तो दूसरा जल तत्व की राशि होने के कारण शत्रु राशि के स्वभाव से परिलक्षित हैं किन्तु , दोनों राशि के स्वामी एक हैं । जो उपरोक्त राशियो के मध्य स्वभाव व गुण में एक समान हो जाते हैं जो मूलतः राशिपति आधारित गुण हैं न की राशि आधारित गुण । शुक्र के साथ भी उपरोक्त ग्रह स्तिथि का निर्माण होता हैं जो एक दूसरे राशि से षष्ठम व अष्टम भाव में हैं । किन्तु , राशि पति एक होने के कारण इसका परिहार हो जाता हैं । उपरोक्त सिद्धांत अनुसार अन्य सभी ग्रह के षष्ठम व अष्टम भाव के राशि स्वामी हो तो उसमे भकुट दोष का पूर्ण प्रभाव रहेगा ऐसा ज्योतिष के सभी आचार्यों का एक मत हैं । भकुट दोष के दुष्प्रभाव से वर व वधू के मध्य शत्रुता पूर्ण रवैया देखने को मिलता हैं ।

भकुट सिद्धांतानुसार ज्योतिष के माध्यम से पति व पत्नी को दो जिस्म एक जान माना जाता हैं । जिसके फलस्वरूप इसका गठन होता हैं । मेरी खुद की अनुभूति से ज्योतिष के आचार्यों नें इसके पीछे का तात्विक सिद्धांत प्रभाव ये रखा हैं की यदि आपके साथी का स्वभाव आपके विपरीत हो तो उसके साथ आपकी मित्रता कैसे सुचारु रूप से चलेगी । व्यक्तिगत स्वार्थ अपने निजी हित को साधने हेतु एक दूसरे के हित का नाश करता हैं । इसीलिए ज्योतिषाचार्यों ने कहा हैं की यदि वर व कन्या की राशि से षष्ठम व अष्टम भाव चंद्र आधारित कुंडली राशि हो तो अशान्ति के साथ मोक्ष हो , वर व वधू की राशि एक दूसरे से नवम व पंचम भाव में स्थित हो तो धर्म कृत्य स्वभाव से संतान हानि हो , तीसरे सिद्धांत अनुसार वर व वधू की राशि स्वामी एक दूसरे से द्वितीय व द्वादश हो तो स्वार्थ रूपी मनोविकार के कारण दरिद्रता हो ।

किन्तु , ज्योतिषाचार्यों ने इसके परिहार हेतु विशेष सिद्धांत ये रखा की द्विजो के नव-मांश कुंडली से यदि राशि स्वामी के मध्य मैत्री पूर्ण संबंध स्थापित हो तो इसका परिहार हो जाता हैं । किन्तु गणना संबंधित कार्यों में इसे संलग्न नहीं किया जाता ।

इसके परिहार हेतु विशेष नियम एक और ज्योतिषाचार्यों के द्वारा ये भी रखा गया हैं की तारा गुण नाड़ी की स्तिथि व द्विजो के नक्षत्रों के मध्य यदि शुभ संबंध स्थापित होता हैं या बनता हुआ प्रत्यक्ष होता हैं तो दुष्ट भकुट दोष का परिहार हो जाता हैं जिसके संदर्भ से ज्योतिषाचार्यों के मत से भकुट दोष का प्रभाव निस्तेज हो जाता हैं क्योंकि एक अकेला नाड़ी सम्पूर्ण दोषों का खात्मा कर देता हैं । ज्योतिष शास्त्र के माध्यम से नाड़ी दोष सबसे प्रमुख दोषों में से हैं । क्योंकि नाड़ी का संबंध आपके जिन अर्थात आनुवांशिक इकाई से संबंधित हैं , जिससे प्राणवायु का संचार होता हैं  हमारे शरीर में कुल ७२००० नाड़ीयाँ होती हैं । नाड़ी के विषय में यदि कहना पड़े तो एक अकेला विषय नाड़ी सिद्धांत से लिखना पड़ेगा ।

उपरोक्त दर्शित दोष स्वाभाविक दोष हैं  जिसके अंतर्गत यदि गण दोष योनीदोष वर्ण दोष षष्ठम-अष्टम दोष , द्वितीय – द्वादश दोष व नव-पंचक दोष का विश्लेषण किया जाता हैं ।

ज्योतिष में द्वितीय भाव षष्ठम भाव अष्टम भाव व द्वादश भाव मारक भाव भाव कहलाते हैं । जो स्थानोचित स्तिथि के अनुरूप मारक प्रभाव को व्यक्त करते हैं । इसी सिद्धांत के अनुरूप ज्योतिषाचार्यों नें कहा हैं की यदि कन्या का जन्म नक्षत्र वर के जन्म नक्षत्र से दूसरा हो तो वो कन्या पति नाशक होती हैं । कन्या अपने स्वार्थ पूर्ति हेतु वर का दोहन करेंगी । ज्योतिष के इस सिद्धांत को इस प्रकार सहज ही समझा जा सकता हैं की यदि धनेश लग्न में हो तो धन की पूर्ति तो हो किन्तु व्यय स्वयं के भोग विलास के संसाधनों में हो । इसी सिद्धांत को ज्योतिष के आचार्यों द्वारा राशि आधारित भकुट पर लागू किया हैं ये ज्योतिष के गूढ रहस्य हैं इसे ध्यान पूर्वक समझना चाहिए । हर एक व्यक्ति की अपना एक आभा होती हैं उस आभा का प्रभाव यदि दोहन करने वाली आभा से लक्षित व्यक्ति का संपर्क हो तो व्यक्ति का क्षय होता हैं ।। इसे तीसरे भाग में समझाने की कोशिश चार्ट के द्वारा किया जाएगा ।।

परिहार संदर्भ ३  

नाड़ी दोष परिहार संदर्भ १.

नाड़ी दोष परिहार के संदर्भ में ज्योतिषाचार्यों के मतानुसार ब्राह्मणों को नाड़ी दोष , क्षत्रिय को वर्ण दोष , वैश्य को गण दोष , तथा शूद्र को योनि दोष प्रबल हो तो विवाह करना श्रेयस्कर नहीं होता ।। किन्तु मेरी ज्योतिषीय अनुभूति अनुसार नाड़ी दोष सभी वर्णों को लगता हैं उपरोक्त ज्योतिषीय सुत्रानुसार ज्योतिषीय वर्णों को लेना उचित होगा । अन्य भौतिक स्तर से व्याप्त सामाजिक वर्ण व्यवस्था पर लागू करना उचित नहीं  ये मेरी नीज अनुभूति हैं ।  ज्योतिषाचार्यों द्वारा ऐसा इसीलिए कहा गया हैं क्योंकि , हर एक राशि अग्नि , वायु , पृथ्वी , व जल तत्व से परिलक्षित हैं । जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा हैं ।

तत्व राशि वर्ण अर्थात समुदाय
अग्नि मेष ,  सिंह , धनु क्षत्रिय
पृथ्वी वृषभ , कन्या , मकर वैश्य
वायु मिथुन , तुला , कुम्भ शूद्र
जल कर्क , वृश्चिक , मीन विप्र ( ब्राह्मण )


उपरोक्त निर्दिष्ट तथ्यों के आधार पर यदि ध्यान दिया जाए तो ज्योतिषाचार्यों द्वारा व्यक्त किए गए कथनों पर निज मत एक ही बनता हुआ प्रतीत होता हैं की राशि व उसके तत्व उसके वर्णों को निर्धारित करते हैं । जैसे की मेष ,  सिंह , धनु राशि वाले जातक व जातिकाओ का संबंध अग्नि तत्व से परिलक्षित हैं जिसका वर्ण क्षत्रिय हैं , दूसरा वृषभ , कन्या , मकर  राशि के वर्ण पृथ्वी तत्व अनुसार वैश्य हैं , तथा  मिथुन , तुला , कुम्भ राशि के वर्ण वायु तत्व से होने के कारण शूद्र  व  कर्क , वृश्चिक व मीन राशि के जातक का जल तत्व से संबंध होने के कारण विप्र कहलाते हैं ।

इस उपरोक्त कथन  ब्राह्मणों को नाड़ी दोष , क्षत्रिय को वर्ण दोष , वैश्य को गण दोष , तथा शूद्र को योनि दोष प्रबल हो तो विवाह करना श्रेयस्कर नहीं होता का संबंध मूल रूप से ये हैं की शरीर में मौजूद नाड़ी शरीर में जल तत्व के प्रवाह को निरन्तरता प्रदान किए हुए हैं । चाहे मूत्र या वीर्य संबंधित हो या रक्त नलिकाये संबंधित हो यदि ये सुचारु रूप से न हो तो नाड़ी दोष का प्रभाव दिखता हैं । जल तत्व होने के कारण हर एक तत्व को ग्रहण करने का सामर्थ्य रखता हैं । भौतिक तौर पर सभी वर्णों पर समान रूप से ज्योतिष के ये सूत्र निर्धारित होते हैं ।  किन्तु , जिन वर्ण समुदाय का जिससे नजदीकी संबंध होता हैं उससे संबंधित दोष उत्पन्न होना बेहद ही कष्टकारी होता हैं । शायद इसी करण वश उपरोक्त कथन ज्योतिषाचार्यों के द्वारा कही गई हैं ।

उपरोक्त विवरण अनुसार क्षत्रिय का वर्ण दोष इसी कारण वश विशेष तौर पर लगता हैं क्योंकि , क्षत्रिय अग्नि तत्व से परिलक्षित होने के कारण यदि वे जल तत्व के साथ संबंध स्थापित करें तो उसके लिए मृत्यु-तुल्य कष्ट का कारण बनता हैं । तत्व के स्वाभाविक सिद्धांत अनुसार अग्नि का सबसे बड़ा शत्रु जल हैं इसीलिए क्षत्रिय वर्ण के पुरुष का विवाहिक संबंध ब्राह्मण वर्ण के कन्या के साथ होना उचित नहीं होता ।

वैश्य वर्ण का गण-दोष प्रमुख तौर पर ज्योतिषाचार्यों द्वारा इसीलिए रखा गया क्योंकि , ये पृथ्वी तत्व के गुण से परिलक्षित हैं अर्थात , जीवन दायनी पृष्ठभूमि यदि सही न हो तो स्वाभाविक स्तर से जीवन का नाश हो जाता हैं । अर्थात इसका स्वभाव भी अपने समुदाय आधारित रहना अति अनिवार्य हैं ।

शूद्र वर्ण का योनि दोष विशेष तौर पर महत्व रखता हैं क्योंकि योनि का अर्थ ज्योतिष में श्रेणी से संबंधित हैं । तात्विक गुणों के आधार पर वायु तत्व के गुणों से परिलक्षित होने के कारण यदि वायु शुद्ध व सहज रूप में जीवात्मा के हित में नहीं रहा तो वो भी कष्टकारी होता हैं । स्वभविक स्तर से एक दूसरे का पतन कर देने वाला होता हैं उदाहरण स्वरूप यदि कोई व्याघ्र किसी गौ को देखे तो गौ की मृत्यु होना स्वाभाविक हैं । स्वाभाविक स्तर से यदि देखा जाए तो शूद्र वर्ण के लिए योनि दोष का होना विवाहिक संबंध के लिए अहितकारी होता हैं । क्योंकि वायु का स्वभाव अपने स्वाभाविक स्तर से निरंतर बहना हैं जिस प्रकार सुगंधित वायु मनोरम व रमणीय स्थल का निर्माण करता हैं और यदि दूषित वायु यदि सुगंधित वायु के साथ हो तो वो सुगंधित वातावरण में विष की भाँति अपना प्रभाव स्थापित करता हैं । इसीलिए शूद्र वर्ण के जातक व जातिका का वर्ण दोष होने पर विवाह करना श्रेयस्कर नहीं होता ।।

नाड़ी दोष परिहार संदर्भ २

ज्योतिषाचार्यों के मतानुसार यदि वर कन्या की राशि एक हो किन्तु , जन्म नक्षत्र भिन्न हो तो नाड़ी दोष का परिहार हो जाता हैं । दोनों का नक्षत्र एक हो किन्तु , राशि भिन्न हो तो भी नाड़ी दोष का परिहार हो जाता हैं । विशेष सूत्र अनुसार यदि नक्षत्र एक हो किन्तु , चरण अलग अलग हो तो भी नाड़ी व गण संबंधित दोष का परिहार हो जाता हैं । ( वृहज्ज-योतिष शास्त्र से लिया गया तथ्य )

उपरोक्त कथन बेहद ही संदेहास्पद स्तिथि को दर्शाता हैं क्योंकि ज्योतिष के जिस जिस सिद्धांतों को मैंने स्व-अनुभूति के स्तर से परीक्षण किया हैं ये ज्योतिषाचार्यों के द्वारा व्यक्त ये कथन थोड़ी भ्रमित करने वाली लगती हैं किन्तु , ज्योतिषाचार्यो के द्वारा स्पष्ट तौर पर अपनी बात इस सिद्धांत के द्वारा रखी गई हैं जिसमे संदेहास्पद स्थिति नहीं होनी चाहिए । उपरोक्त कथन हेतु इस नीचे दर्शाये गए नक्षत्र व राशि स्वामी का अवलोकन करें तो इस कथन का हल स्वतः मिल जाता हैं । किन्तु जिस प्रकार इस तथ्य को ज्योतिष विज्ञों द्वारा लिया जाता हैं वो उचित नहीं हैं क्योंकि मेरे अनुसार यदि सिर्फ नक्षत्र और राशि बदलने पर नाड़ी दोष का परिहार हो जाता हैं ! तो फिर राशि व नक्षत्र दोनों ही बदल जाए तो नाड़ी दोष का परिहार क्यों नहीं होता ? ये चिंतनीय विषय ज्योतिष के छात्रों के लिए बन जाता हैं । उपरोक्त कथन में राशि एक हो किन्तु नक्षत्र अलग अलग हो तो नाड़ी दोष का परिहार होगा । अन्य सिद्धांत के अनुसार पूर्ण रूप से परिहार नहीं करेंगी । किन्तु इसके लिए कई और गुणों का पूर्णतया शुद्ध होना अति-आवश्यक हैं । तत्पश्चात ही नारी दोष का परिहार होगा ।। 

उदाहरण स्वरूप लिया गया ज्योतिषीय सिद्धांत

राशि / नक्षत्रनक्षत्र आधारित गणनक्षत्र आधारित नाड़ी
मेष / ( अश्विनी ४ चरण  , भरणी ४ चरण , कृतिका १ चरण  ) देव / मनु / राक्षस आदि / मध्य / अंत
वृषभ / ( कृतिका ३ चरण , रोहिणी ४ चरण , मृगशिरा २ चरणमनु / देव / मनुअंत / मध्य / आदि


जैसे वर व वधू का जन्म मेष राशि में हुआ हैं किन्तु , वर का जन्म अश्विनी नक्षत्र में और वधू का जन्म भरणी में हो तो वर की नाड़ी आदि व वधू की नाड़ी मध्य होंगी तो इस सिद्धांत से दोनों को नाड़ी दोष नहीं लगेगा ।।

नक्षत्र एक हो किन्तु चरण अलग अलग हो तो परिहार की संभावना सिर्फ एक शर्त पर होगा की अन्य सभी गुण वर व वधू के पूर्णतया शुद्ध रूप में हो । ये मेरा आंतरिक मत हैं ।।

परिहार संदर्भ ४

षडाष्टक दोष परिहार उपाय

वर व वधू की कुंडली राशि एक दूसरे से षष्ठम व अष्टम भाव में हो या द्वितीय व द्वादश भाव में हो  या एक दूसरे के राशि से नवम व पंचम भाव में विराजमान हो तो कुंडली दोष पूर्ण हो जाता हैं । दुष्ट षडाष्टक दोष परिहार हेतु  एक जोड़े गायों का दान नवम पंचम दोष परिहार हेतु रजत और कांस्य पात्र का दान  करनी चाहिए ।।

नाड़ी दोष से संबंधित दोष में गौ , अन्न ,  सुवर्ण (सोना ) , वस्त्र , का दान व  महामृत्युंजय का जाप , रुद्राभिषेक  करने चाहिए ।। द्वितीय द्वादश दोष में ब्राह्मणों को अन्न , वस्त्र , व मनोनुकूल दक्षिणा आदि से संतुष्ट करके विवाह करना शुभ हैं ।।

परिहार संदर्भ ५

नमाक्षर परिहार :-

हर एक व्यक्ति का नाम किसी न किसी अक्षर से परिलक्षित होता हैं । वो प्रथम अक्षर उसके राशि को निर्धारित करता हैं । ज्योतिष के आचार्यों ने अपने शोध में व अपने अनुभूति में पाया की कुछ नामक्षर के वर्ग संज्ञा से जैसे क वर्ग के (  क ख ग घ ड़  ) तो उससे पंचम वर्ग प वर्ग  (  प फ ब भ म ) वर्ग हैं । इसे ऐसे समझने चाहिए । ज्योतिषीय सुत्रानुसार

यदि वर व वधू के नमाक्षर के वर्ग से पंचम वर्ग के नामाक्षर से वर व वधू में से किसी का नमाक्षर

होता हैं तो वो विवाहिक जीवन में स्वाभाविक रूप व स्तिथि से अच्छा नहीं होता ।। वास्तव में इस तथ्य का चलन विशेष तौर पर नहीं देखा जाता किन्तु याद रखे वर का राशि स्वामी यदि सिंह हैं तो वधू की राशि यदि मकर हो तो स्वभावगत दोनों में स्वाभाविक स्तर से विच्छेदात्मक स्तिथि को जन्म देता हैं । क्योंकि सिंह राशि के नक्षत्र प वर्ग से पंचम वर्ग को मकर राशि के श्रवण नक्षत्र में पड़ने वाले क वर्ग के  ( ख  ) अक्षर को परिलक्षित करता हैं । श्रवण नक्षत्र के स्वामी चंद्र देव और मघा नक्षत्र के स्वामी केतु देव में स्वाभाविक रूप से शत्रुता वाली भाव हैं । मित्र व शत्रु ग्रहों के अवलोकन हेतु नैसर्गिक मैत्री चक्र का अध्ययन करें तो आपको स्वतः पता चल जाएगा की किस ग्रह का कौन शत्रु व मित्र हैं । किन्तु यहाँ पर विशेष तौर से स्वाभाविक स्तर पर देखना प्रयोचित होगा ।

इसके परिहार हेतु सिंह और मकर राशि का यदि वर व वधू में कही न कही संबंध स्थापित होता हैं तो झगड़े व मुसीबत की स्तिथि को जन्म देता हैं । इस सिद्धांत के अनुसार पारिवारिक जनों के मध्य भी प्रीति व अप्रीति को जाना जा सकता हैं । इस सिद्धांत के विशेष नियम हैं किन्तु सरल इसके लिए किसी और लेख के माध्यम से विस्तार से अवलोकन करने की जरूरत होंगी । इसीलिए इस तथ्य का विश्लेषण यहाँ अब रोक रहा हूँ ।।

परिहार संदर्भ ६

नक्षत्र परिहार :-

ज्योतिष के आचार्यों ने नक्षत्र आधारित कुछ विशेष योग को बताया हैं जिसके बारे में यहाँ विवेचना करने जा रहा हूँ । वास्तव में ज्योतिष के सिद्धांत का मूलाधार नक्षत्र आधारित ही हैं । जिसमे चंद्रमा का विशेष योगदान जब इन नक्षत्रों के राशियों से होता हैं तो फलित ज्योतिष को संजीवनी मिलती हैं । वैसे तो सभी ज्योतिष के प्रमुख दो भाग हैं एक गणित भाग दूसरा फलित भाग जिसमे ये कहना उचित ही हैं की फलित ज्योतिष के लिए संजीवनी का कार्य नक्षत्रों द्वारा ही किया जाता हैं ।  इसीलिए नक्षत्र आधारित विशेष योग को जानना दिव्यदृष्टा आचार्यों की  सबसे बड़ी उपलब्धि में से एक को मैं मानता हूँ ।

यदि रेवती नक्षत्र से ६ नक्षत्र पर्यंत पूर्व भाग में हर एक ज्योतिषविज्ञ को समझना चाहिए । आद्रा से १२ नक्षत्र तक मध्य भाग ज्योतिष के विज्ञों को समझना चाहिए , तत्पश्चात शेष बचे नक्षत्र ज्येष्ठा से ९ नक्षत्र तक पर भाग समझना चाहिए ।

वास्तव में मेरी अनुभूति के अनुसार काल पुरुष के शरीर के अंगों पर आधारित पूर्व , मध्य व पर को यदि बाँट दिया जाए तो काल पुरुष की कुंडली स्वरूप राशियों के व शरीर के अंग आधारित नक्षत्रों के प्रभाव को उपरोक्त कथन द्वारा सरलता से समझा जा सकता हैं ।

यदि वर व वधू के कुंडली में चंद्रमा का गोचर पूर्व भाग में हो तो स्त्री को पुरुष प्रिय होता है । यदि मध्य भाग के नक्षत्र में वर व वधू के चंद्रमा का गोचर हो तो द्विज के मध्य परस्पर प्रीति हो । यदि पर भाग के नक्षत्र में दोनों के चंद्रमा का गोचर हो तो पुरुष को स्त्री प्रिय होती हैं ।

परिहार संदर्भ ७

मंगल दोष परिहार या मांगलिक दोष परिहार

ज्योतिष के आचार्यों ने ज्योतिष के क्षेत्र में जितने भी क्रूर अर्थात ( कठोर स्वभाव के ग्रह ) व पापी अर्थात (अधर्मी व  अन्यायी )  ग्रह हैं उससे संबंधित मामलों में विशेष सावधानी रखने की कोशिश की हैं । उसी में से एक मंगल क्रूर ग्रह की श्रेणी में आता हैं । मंगल का स्वभाव क्रूरता से पूर्ण हैं स्वभाव से क्रोधी व अग्नि तत्व राशि व स्वभाव को परिलक्षित करने वाला ग्रह हैं । राशि स्वामी-पति होने के कारण ये जल तत्व की राशि का भी स्वामी हैं । अग्नि और जल दोनों के स्वामी पति होने के नाते ये गरम जल की भाँति इनका स्वभाव व गुण हैं । मंगल ग्रह की व्याख्या क्रोध रूपी  क्षणभंगुर स्वभाव का मूल स्वाभाविक परिचय के रूप में होता हैं । क्रोध की अग्नि ज्वाला में जल तत्व का नाश होना इसका स्वाभाविक गुण हैं ।

मंगल ग्रह के बारें में पूर्वोक्त लेख के माध्यम से बताने की कोशिश की गई हैं जिस पर आगे ग्रह विश्लेषण सीरीज में विस्तार से बताने की कोशिश होंगी ।।

ज्योतिष के आचार्यों ने मंगल की तीन दृष्टियाँ ( चतुर्थ सप्तम व अष्टम ) प्रमुख तौर दृष्टिगोचर अपने दिव्य दृष्टि द्वारा किया हैं । इसी दृष्टि प्रभाव के कारण ज्योतिष के आचार्यों के द्वारा मंगल से संबंधित उत्पन्न दोष के बारें में व्याख्या की गई हैं । मंगल स्वभाव से झगड़े से उत्पन्न समस्या का घटक हैं । इसी कारण से मंगल जहाँ रहे और जिस अभीष्ट स्थान को अपनी दृष्टि से प्रभावित करें वहाँ संघर्ष की स्तिथि उत्पन्न होती हैं । इतना ही नहीं जिस ग्रह के साथ रहे उससे संबंधित स्व-भाविक प्रभाव में भी संघर्ष की स्तिथि उत्पन्न होती हैं । मेरी तुक्ष अनुभव के आधार विंदु पर शायद इसी कारण से ज्योतिष के आचार्यों ने मंगल यदि लग्न में निवास करें तो सप्तम दृष्टि से , द्वादश भाव में निवास करें तो अपने अष्टम दृष्टि से , चतुर्थ में निवास करें तो अपनी चतुर्थ दृष्टि से सप्तम में निवासित हो तो अपने स्व-स्थान से व कुंडली के अष्टम भाव में निवासित हो तो अपने जीवन साझेदार के बुद्धि विवेक द्वारा विवाहिक जीवन में संघर्ष की स्तिथि को उत्पन्न करने वाला घटक बनता है । 

ज्योतिषीय विश्लेषण के क्रम में लग्न कुंडली व चंद्र कुंडली को जीवन से संबंधित मामलों में ज्योतिषीय फलार्पण हेतु प्रयोग में लाया जाता हैं । इस सिद्धांत के अनुसार चंद्रमा के साथ किसी भी भाव में मंगल का समन्वय हो तो मंगल से संबंधित दोष प्रबल हो जाते हैं ।

उपरोक्त स्तिथि के अनुसार यदि मंगल का स्वरूप का गठन लग्न व चंद्र कुंडली में हो तो पुरुष जातक मंगला व स्त्री जातक मंगली हो जाती हैं । किन्तु , उपरोक्त स्तिथि अनुसार यदि मंगल अपने मेष राशि व वृश्चिक राशि व मकर राशि में हो तो मंगल से संबंधित दोष का परित्याग हो जाता हैं ।

उपरोक्त स्तिथि अनुसार यदि कोई पापी ग्रह शनि व केतु साझेदार के कुंडली के उसी गृह में विराजमान हो तो उत्पन्न मांगलिक दोष के प्रभाव का निस्तेज हो जाता हैं ।

ज्योतिष के आचार्यों के मत के संदर्भ में मेरी विचार धारा के मत से ये तर्कपूर्ण संगत वाली विचारधारा हैं क्योंकि , क्रूरता का प्रतिभेदन क्रूरता से ही दिया जा सकता हैं या फिर दुष्ट कर्म से क्रूरता का प्रतिभेदन किया जा सकता हैं ।।  इसी के साथ गुरु के नाम से अपनी वाणी को विराम।।      

ॐ नमों रुद्रात्मिकाय: आनंदेश्वराय महादेवाय नमो नमः , जय गुरुदेव , जय महाकाल ।।

ASTROLOGER :- MR. R.K.MISHRA     CONTACT NUM :- 06202199681  BHAGALPUR ASTROLOGY & RESEARCH CENTER


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