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पुनर्जन्म सिद्धाँत ।

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पुनर्जन्म सिद्धाँत ।

पूर्व जन्म सिद्धाँत ।

वैसे तो पूर्व जन्म सिद्धाँत को लेकर के कई प्रकार की थ्योरी ज्योतिष शास्त्र के माध्यम से प्रसिद्ध हैं । जिसमे नवग्रहों की उपस्थिति को विशेष तौर पर महत्व दिया गया हैं । किन्तु , वही पर सबसे सटीक प्रभाव के रूप में पंचम भाव का विशेष महत्व हैं । इस पंचम भाव को ज्योतिष शास्त्र के द्वारा पूर्व जन्म के सिद्धांतो के लिए निर्धारित भाव के रूप हमारे प्राचीन महर्षियों द्वारा निर्धारित किया गया हैं । मेरी खुद की अनुभूति में भी पंचम भाव का पूर्व जन्म सिद्धाँत हेतु विशेष महत्व हैं ।

पूर्व जन्म सिद्धाँत को लेकर के व्याख्या करना इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता हैं क्योंकि, वर्तमान परिपेक्ष्य में कई बार ऐसा दिखता हैं की खुद के द्वारा किए गए सत्कर्म के परिणाम फल के वावजूद भी हमे उसका फल सत्कर्म के रूप में नहीं मिलता । व्यक्ति स्वयं अपने जीवन भर की कहानी के पन्नों को कई बार उल्टा देता हैं किन्तु , पारिणामिक तौर पर उसे किसी भी प्रकार से संतुष्टि भरे जबाब की प्राप्ति नहीं होती । इस परिस्तिथि में पूर्व जन्म के बारें में जानना बेहद ही रुचिकर विषय हो जाता हैं । ज्योतिष तीन जन्मों की कहानी को व्यक्त करता हैं किन्तु उनमें से दो जन्मों कि कहानी सटीकता से बताता हैं । पहला वर्तमान जन्म की कहानी और पूर्व जन्म की कहानी आगामी जन्म की कहानी में व्यक्तिगत तौर पर बदलाव लाया जा सकता हैं किन्तु , इसके लिए वर्तमान जन्म के कर्म बेहद ही मायने रखते हैं । व्यक्ति द्वारा किए गए कर्म आगामी मार्ग को प्रशस्त करता हैं इसमें संदेह नहीं होने चाहिए । क्योंकि आज का भोग पूर्व के कर्मों के आधार पर निश्चित हैं तो आगामी भोग आज के कर्म पर निर्धारित हैं ।

पूर्व जन्म सिद्धाँत हेतु वर्तमान जन्म में जन्म के समय प्राप्त की गई ग्रहों की स्तिथि और पंचम भाव की राशि का विशेष महत्व हैं । पंचम भाव में उदित राशि आपके पूर्व जन्म के स्वभाव और मानसिक स्तिथि की विशेष रूप से व्याख्या करता हैं । वही पर पंचम भाव की राशि को लग्न बनाकर के देखने के पश्चात इस बात की पुष्टि हो जाती हैं की व्यक्ति किस भाव से संबंधित वस्तुओ का भोग व किस भाव से संबंधित रिश्तों से कटुता रखें हुए इस जन्म में आया है उसके पश्चात ये देखिए की उस व्यक्ति के जीवन में इस जन्म के परिपेक्ष्य में जिन तथ्यों के साथ उसकी सबसे बड़ी अनबन चल रही हैं उस भाव से संबंधित मामलों में वो व्यक्ति पूर्व काल में कही परेशानी उत्पन्न कर के सुख का भोग तो नहीं कर रहा हैं । मैंने इसे खुद की कुंडली पर और कई जातक व जातिका की कुंडली पर लागू कर के देखा तो पाया की ये व्यक्ति पूर्व जन्म में जिन जिन रिश्तेदारों और संबंधित विषय वस्तुओ का भोग कुटिलता और परेशानियों को उत्पन्न करके जिन जिन माध्यमों द्वारा स्पष्ट होता हैं ठीक वही भाव व्यक्ति के वर्तमान जीवन में ठीक उसी प्रकार से उसी रिश्तेदारों द्वारा उसके जीवन में परेशानी बनकर के आता हैं ।

ग्रहों की स्तिथि बताती हैं की व्यक्ति का स्वभाव और विचार कैसा रहा हैं । वैदिक ज्योतिष के जो सूत्र व नियम लग्न पर निर्धारित होते हैं ठीक उसी प्रकार से पंचम लग्न पर सूत्रों से निर्धारित करने से वर्तमान जीवन में होने वाले घटनाओ को लेकर के करने चाहिए । मैंने अपने शोध में इस बात को देखा व समझा हैं की जिस कार्य को लेकर के पूर्वजन्म में जातक व जातिका द्वारा गलत तरीके से लाभ लेते हुए देखें गए हैं ठीक उसी मामलों में वर्तमान जन्म में उसी से संबंधित मामलों में परेशानियों का सामना करना पड़ता हैं ।

वास्तव में मैंने कई जातकों की कुंडलियों पर वर्तमान में विशेष ध्यान देते हुए एक बार अपनी संतुष्टि हेतु पंचम लग्न का विश्लेषण आवश्यक तौर पर करता हूँ ।

ज्योतिष जगत के पितामह महर्षि पाराशर द्वारा इस पंचम भाव का विशेष रूप से विश्लेषण D60 CHART  ( अर्थात षष्ठयांश चार्ट का विशेष तौर पर विश्लेषण करने की ) सलाह  दिया गया हैं । इसके पीछे का करण ये हैं की 

१२* ५ = ६० होता हैं ।

जैसे की D1 से शरीर का D2 से धन का D3 से सामर्थ्य का D4 से सुख का D7 से संतान का D9 से सहयोगियों का अन्य जितने भी चार्ट हैं ठीक उसी प्रकार से D60 CHART  द्वारा हम पूर्व जन्मों की कहानियाँ भी विशेष रूप से देखते हैं । साथ ही साथ चंद्र कुंडली के भी पंचम भावस्थ स्तिथि का सूक्ष्म विश्लेषण करने चाहिए । उपरोक्त पद्धति अनुसार किए जाने वाले शोध आपको आपके पूर्व जन्म आधारित घटनाओ का विशेष रूप से जानकारी देता हैं ।

सांकेतिक प्रारूप :-

कुछ हद तक हमारे महर्षियों के द्वारा व वर्तमान में मौजूद संतों व ज्योतिष के मर्मज्ञों द्वारा इस बात की भी पुष्टि की जाती हैं की हमारी आत्मा (अर्थात, जिस तत्व के होने से भौतिक शरीर में प्राण रूपी ऊर्जा का संचार होता हैं ) अपने पूर्व जन्मों के गुणों को लेकर के इस धरा पर पुनः नए शरीर को धारण करता हैं । और अपनी पूर्व जन्मों के कृत्यों को आंतरिक स्तर पर महसूस व भावनात्मक तौर पर उससे जुड़ा हुआ अनुभव करता हैं । कोई व्यक्ति यदि बहुत बड़ा व्यापारी हो तो वो व्यक्ति इस जन्म में भले ही किसी सरकारी नौकरी के पद पर क्यों न हो वो व्यापारी वाले लक्षण से परिपूर्ण होता हैं । वो आंतरिक तौर पर इसे सहज भाव से महसूस करता हैं और अपने व्यावहारिक गुणों से प्रदर्शित करता हैं । व्यक्ति के कर्म उसके आत्मिक स्तर पर कभी भी उसका पीछा नहीं छोड़ती ऐसा महर्षियों व अन्य विद्वत जनों का मत हैं ।

मेरा मत :-

वर्तमान परिपेक्ष में मेरी निज शोध अनुसार मेरा मत ज्योतिष के उन मूल आधार विंदु पर स्थित हैं जिसे मैं आप के समक्ष रख रहा हूँ ।  चुकी काल चक्र का पंचम भाव ज्ञान व गुरु से संबंधित हैं । इस भाव के प्रबल कारक शुक्र व गुरु हैं । क्योंकि मेरा मत ये हैं दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य और देवताओ के गुरु वृहस्पति ये दोनों इस भौतिक सत्ता के प्रबल कारक होने के नाते इनके संबंधित विषयों के बारें में जानना अतिआवश्यक हो जाता हैं । क्योंकि जन्म कोई भी क्यों न हो भौतिक सत्ता का निर्धारण में इन दोनों महागुरुओ का ही हाथ रहा हैं । इनका भी सूक्ष्म स्तर पर विश्लेषण कर लेने चाहिए । मेरा मत ये भी हैं की जिस जन्म कुंडली के बारें में हम वर्तमान जन्म से संबंधित मामलों को लेकर के मानते हैं तो उसका पंचम ज्ञान का भाव पूर्व जन्म के सिद्धाँतों के बारें में कैसे निर्धारित कर सकता हैं ? इस संदर्भ में मेरा मत थोडा सा मतभेद की स्थिति को दर्शाता हैं । मेरे वर्तमान मत अनुसार चतुर्थ भाव भावनाओ का हैं भावनाओ की वाणी व धन का भाव पंचम भाव हैं । अर्थात ज्ञान का भाव हैं ज्ञान प्रायोगिक तौर पर भावनाओ को व्यक्त करने का एक विशेष साधन हैं । क्योंकि व्यक्ति का ज्ञान ही व्यक्ति के भावनाओ का वाणी बनता हैं । भावनाओ का अस्तित्व भौतिक सत्ता से व्यावहारिक तौर पर क्रियाशील नहीं हैं । भावना आंतरिक सत्ता से संबंधित विषय वस्तु होने के कारण उसकी वाणी कैसे भौतिक सत्ता का परिचायक हो सकता हैं ? क्योंकि एक मन तो पुनर्जन्म के सिद्धाँतों के विपरीत क्रियाशील हैं ।

पुनर्जन्मों के सिद्धाँतों हेतु समस्त ग्रहों की विश्लेषण करना अतिआवश्यक हैं क्योंकि पुनर्जन्म का सिद्धाँत एक अभौतिक मान्यता हैं ।

मेरा मत हैं की पंचम भाव को लग्न बना कर के व्यक्ति के आकाशीय पंचम लग्न निर्धारित करें । और उससे उस व्यक्ति की आकाशीय छवि की गणना करें तो व्यक्ति के आंतरिक स्तर पर लक्षित स्वभाव प्रत्यक्ष तौर पर उजागर हो जाता हैं । और तो और इस प्रक्रिया से उसके आंतरिक जीवन के रहस्यों से पर्दा उठाया जा सकता हैं ।

वर्तमान स्तिथि में इस तथ्य पर शोध निरंतर जारी हैं । अतः आगामी स्तर पर कुछ परिवर्तन देखें जा सकते हैं । या फिर इसी सिद्धाँत को और स्पष्ट तौर पर व्यक्त किया जा सकता हैं ।

विशेष :-

पूर्व जन्म सिद्धाँत हेतु मैं जन्म लग्न स्थित ग्रहों की स्तिथि के साथ साथ लग्न के पंचम भाव से निर्मित लग्न और चंद्र कुंडली का सूक्ष्म विश्लेषण इस आधार पर करने की सलाह देता हूँ की आपकी वर्तमान स्तिथि इसीलिए हैं क्योंकि आपने पूर्व जन्म में किसी न किसी रूप में क्रियात्मक और स्वाभाविक तौर पर दुःसाहस किया तो उसके परिणाम स्वरूप आपके इस जन्म में उस विषय वस्तु से संबंधित मामलों में परेशानियाँ देखने को मिली । ऐसा मान कर के पंचम भाव को लग्न और षष्ठयांश कुंडली का व चंद्र कुंडली समेत विशेष तौर पर विश्लेषण करने चाहिए ।

जय महाकाल ।।

ज्योतिषविज्ञः- आर के मिश्र ।


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