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प्रेम सिद्धाँत ।

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प्रेम सिद्धाँत ।

प्रेम सिद्धाँत ।

वैसे तो मेरे लिए अपने कार्य से संदर्भित मामलों को लेकर के बेहद ही आकर्षण हैं । क्योंकि , मुझे जब भी किसी भी प्रकार की परेशानियों का सामना अपने जीवन में करना पड़ा हैं ! तो एक ज्योतिष के मर्मज्ञ के रूप में होने के कारण मेरा दायित्व रहा की ज्योतिष संदर्भित प्रश्नों का उत्तर प्रायोगिक स्तर पर दें । क्योंकि मैंने आज तक वैसे प्रश्नों के उत्तर जो शास्त्रों में समुचित रूप से वर्तमान परिपेक्ष्य में उपलब्ध नहीं हैं किन्तु , एक ज्योतिष के विद्यार्थी होने के कारण मैंने ज्योतिष से जीना सीखा और उसी के आधार विंदु पर जीवन से जुड़े हर एक पहलू को विज्ञानिक आधार पर समझने की कोशिश किया ।

आज का विषय भी ज्योतिष विज्ञान के प्राचीन सिद्धांतों के आधार पर विस्तृत वर्णन प्रेम सिद्धाँत के बारें में विज्ञानिक व प्रायोगिक स्तर पर बेहद ही सटीक हैं ।

प्रेम भावनाओ का समावेशित स्वरूप हैं इसमे कतई संदेह नहीं ! भावना जब किसी तथ्य या विषय व वस्तु से जुड़ जाता हैं तो वो  होने वाला जुड़ाव प्रेम के रूप में प्रस्फुटित होने लगता हैं । वैसे तो जन्म कुंडली में १२ भाव सर्वव्याप्य हैं ! तो क्या जन्म कुंडली के ये १२ भाव प्रेम के उस दुर्लभ और गुह्य ब्रह्म सिद्धाँत के बारे में बताता हैं ? तो आइए इसी काल चक्र के माध्यम से अपने आराध्य अपने गुरु आनंदेश्वर नाथ महादेव व बड़ी माँ जगतजननी तारिणी के ध्यान पश्चात इस दुर्लभ ब्रह्म विद्या के बारे में उनसे आदेश लेते हुए आप सभी के समक्ष अपनी लेखनी के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं ।

लेखनी से पूर्व एक विशेष बात आप सभी के समक्ष स्पष्ट तौर पर रखना चाहता हूँ । इस संसार में जीतने भी मनुष्य गण हैं । वे कभी भी एक तथ्य से और एकाँकीकार भावस्थ होकर प्रेम नहीं करता प्रेम के भी काल चक्र के भाव अनुरूप १२ प्रकार प्रकृति ने स्वाभाविक स्तर पर निश्चित किया हैं । किन्तु , उससे पूर्व एक प्रश्न यह हैं की क्या प्रेम के बिना कोई व्यक्ति क्या अपने आस्तित्व की उम्मीद कर सकता हैं ? तो इसका एक ही उत्तर हैं प्रेम के बिना कोई भी व्यक्ति अपने अस्तित्व की कल्पना कर ही नहीं सकता ! ये भी अकाट्य सत्य इस ब्रह्मांड के चराचर में सर्व-व्याप्य हैं । वैसे तो प्रेम हृदय प्रदेश की व्यक्तिगत छवि हैं किन्तु , फिर भी ये व्यक्तिगत छवि महाकाल के द्वारा रचित स्वयं के कालचक्र के सिवा और कौन व्याख्या करने में सक्षम हैं । तो आइए जानते हैं क्या कहता हैं महाकाल द्वारा विरचित कालचक्र !

  • काल चक्र का प्रथम भाव तनु अर्थात शरीर का भाव हैं । हमारा शरीर जो व्यक्तिगत तौर पर सबसे ज्यादा करीब हैं और व्यक्ति अपने शरीर के प्रति बेहद ही संवेदनशील होता हैं । ये संवेदना भी भावनाओ से संबंधित हैं क्योंकि ये हमारे अस्तित्व को भौतिक स्तर पर निर्धारित करता हैं । व्यक्ति का स्वयं के इर्द गिर्द स्वयं के लिए भावनाओं का होना व्यक्ति को खुद के प्रति प्रेम का होना परिचायक हो जाता हैं । शायद ही कोई ऐसा हो जिसे खुद अपने आप से प्रेम न हो । किन्तु , सिर्फ खुद से प्रेम करने वाला सबसे करीबी परिवार के सदस्यों हेतु काल बनने वाला अपस्वार्थी व्यक्ति में से हैं ।
  • काल चक्र का दूसरा भाव धन का होता हैं कुटुंब का होता हैं और बुद्धि का होता हैं । कई व्यक्तियो को मैंने देखा और उनसे वार्तालाप और उनकी कालचक्र के योग से उनकी सोच और भावनायें धन बुद्धि और कुटुंब के प्रति बेहद ही संवेदनशील भावनात्मक तौर पर निर्धारित हैं । उसके सोच में कुछ और नहीं होता वो धन और बौद्धिक क्षमता के प्रति बेहद ही भावनात्मक रूप से निष्ठावान होता हैं । उसे मित्रता समझ में नहीं आती वो साझेदार नहीं बन सकता किन्तु , इसके विपरीत वे अपने कुटुंब जनों के प्रति बेहद ही संवेदनशील रहता हैं । ऐसे व्यक्ति अपने परिवार पर ध्यान दें या न दें किन्तु , वे अपना प्रेम अपने कुटुंब जनों के प्रति बेहद ही सच्ची निष्ठा से व्यक्त करते हैं । और इसके फलस्वरूप व्यक्ति अपना स्वयं का नुकसान सदैव करते हैं । स्वयं के द्वारा बौद्धिक मेहनत से अपने कुटुंबियों के सुख समृद्धि करते हैं ।
  • कालचक्र का तीसरा भाव बल और पराक्रम का भाव हैं । महाकाल के द्वारा काल चक्र के माध्यम से बल और पराक्रम का संबंध छोटे भाई बहनों के प्रति बताया गया हैं । जब व्यक्ति स्वयं के प्रति बेहद ही संवेदनशील हो जाता हैं तो ऐसे व्यक्ति अपना राह स्वयं निर्धारित करते हैं ! और अपने छोटे भाई बहनों के लिए एक पथप्रदर्शक के रूप में स्वयं को स्थापित करते हैं । इनका विशेष रूप से अपने से घर में छोटे भाई बहनों के साथ खड़ा रहना भावनात्मक तौर पर निश्चित होता हैं । इनके प्रेम का आधार अपने से छोटे भाई बहनों के इर्द गिर्द रहता हैं इनके व्यक्तित्व में बदलाव भी जीवन में भाई बहन के कारण ही आता हैं । व्यक्तिगत तौर पर ऐसा व्यक्ति स्वयं के लिए परिश्रम संघर्ष करता हैं किन्तु , यदि कोई उसके छोटे भाई बहनों के ऊपर किसी भी प्रकार का आघात और प्रतिघात हो तो उसके लिए वो ढाल के रूप में सदैव खड़ा रहता हैं ।
  • काल चक्र का चौथा भाव हृदय के भावनाओ का होता हैं माता का संबंध इस भाव से कालचक्र के माध्यम से महाकाल ने निर्धारित किया हैं । व्यक्तिगत तौर पर व्यक्ति का भावनात्मक संबंध अपने घर के प्रति बेहद ही संवेदनशील होता हैं । अपने घर के प्रति वो इतना संवेदनशील होता हैं की उसके जीवन का हर एक सिद्धाँत अपने घर के इर्द गिर्द होता हैं । व्यक्ति का प्रेम घर के जिम्मेदारियों और घर परिवार के सदस्यों के लिए अपने कुटुंबजनों तक का सहयोग हमेशा करता हैं । व्यक्ति का रिश्ता घरेलू स्तर पर ही निर्धारित होता हैं । ऐसे में व्यक्ति स्वयं का माता का घर का और यात्रा वाली मनोरथों के प्रति बेहद ही संवेदनशील रहते हैं । और उनके प्रेम का आधार सिर्फ और सिर्फ घर के जिम्मेदारियों के प्रति निष्ठावान बनना लक्षित होता हैं । ऐसे में कई अन्य रिश्ते खराब देखें जाते हैं । क्योंकि इनके जीवन का कोई विशेष उद्देश्य या लक्ष्य नहीं होता होता हैं तो घर और माँ के प्रति समर्पण ।
  • काल चक्र का पाँचवाँ भाव ज्ञान का होता हैं गुरु का होता हैं और संतान का भाव होता हैं , और तो और यही वो भाव हैं जहाँ से प्रेम को लक्षित किया जाता हैं । जब व्यक्ति का भावनात्मक संबंध ज्ञान की पिपासा से संबंधित हो तो वो पुस्तक और गुरु से संबंधित मामलों में और अपने जीवन जीवनसाथी से व प्रेम संबंध से स्थापित रिश्तों से संबंधित मामलों में अपने प्रेम का प्रदर्शन अत्यधिक तौर पर करते हैं और व्यक्ति का ध्येय भविष्य में अपने संतान के कल्यानार्थ हेतु व अपने प्रेम से संबंधित व्यक्तियो से संबंधित मामलों हेतु अर्जित अपने समस्त ज्ञान का समर्पण कर देता हैं । ऐसे व्यक्ति द्वारा घर कुटुंब के मामलों में थोड़ी उदासीनता देखने को मिलती है । क्योंकि ऐसे व्यक्ति का ध्येय केवल और केवल अपने प्रेमी सहचर के प्रति ही निष्ठावान रहता हैं । क्योंकि इनके किसी भी रिश्ते का आधार अपने भविष्य रूपी संतान के प्रति और अपने प्रेमी व प्रेमिका के प्रति बेहद ही संवेदनशील रहता हैं । ऐसा व्यक्ति स्वाभाविक रूप से स्वार्थी होता हैं और दुनियाँदारी से संबंधित मामलों में उदासीनता का शिकार हो जाता हैं । इनके प्रेम का आधार खुद के प्रति ही होता हैं किन्तु , ये ज्ञान पिपासु की भाँति व्यवहार करते हैं ।
  • कुंडली में छठा भाव शत्रु का संघर्ष का रोग का और ऋण का होता हैं । कुछ व्यक्तियो के जीवन में शत्रु का होना संघर्ष की स्तिथि रोग की स्थिति और ऋण की स्थिति विशेष तौर पर देखने को प्राप्त होती हैं । ऐसे व्यक्तियो के प्रेम और निष्ठा अपने कार्य के प्रति अपने परिश्रम के प्रति अपने आप के प्रति ही निर्धारित हैं । ये किसी अन्य पर विश्वास ही नहीं करते ये व्यक्ति स्वयं के प्रति ही अपने प्रेम को दर्शाते हैं और स्वयं के प्रति ही निष्ठावान जीवन पर्यंत बने रहते हैं । क्योंकि जब व्यक्ति के जीवन में संघर्ष ही हो तो वो किसी और पर क्या भरोसा करेगा जब सभी उसके व्यक्ति के शत्रु ही हो जीवन में रोग ही हो ऋण ही हो तो ऐसे में व्यक्ति से कौन भावनात्मक स्तर पर  संबंध स्थापित करेगा । ऐसे में ऐसे व्यक्ति स्वयं से प्रेम करते हैं और अपने आप पर ही इनका भरोसा इनके स्वयं के प्रति अखंड प्रेम का परिचायक हैं । और ये स्वयं से ही अपने रास्ते का निर्धारण करते हैं अपने भुजाबल पर भरोसा होना इनकी खासियत होती हैं । क्योंकि जीवन की कहानी थोड़ी उदासीनता से गढ़ी हुई होती हैं ।
  • कालचक्र का सप्तम भाव सहचर का होता हैं , विपरीत लिंग का होता हैं , साझेदारी का होता हैं , यही वो भाव हैं जो व्यापार व मित्रता का भाव बनता हैं । व्यक्तिगत तौर पर विपरीत लिंग के प्रति संवेदना और निष्ठा से बने रिश्ते व पति पत्नी के मध्यांतर प्रेम का परिचायक हैं । ऐसे व्यक्ति का विशेष ध्येय अपने साझेदारों के प्रति निष्ठावान होना लक्षित हैं इनका प्रेम अपने सहचर व विपरीत लिंगी व्यक्तियो के संदर्भ में विशेष रूप से देखने को मिलता हैं । इनके प्रेम का आधार विशेष रूप से अपने सहचर व सहचारिणी पर विशेष रूप से निर्धारित होता हैं । अपने कार्य में ये मैत्रीपूर्ण संबंधों के प्रति बेहद ही जागरूक और निष्ठावान रहते हैं इनका यही निष्ठा इनके प्रेम का परिचायक होता हैं । घर से संबंधित मामलों में स्तिथि उत्तम देखने को मिलती हैं । क्योंकि इनके जीवन का आधार विंदु अपने सहचर पर विशेष रूप से देखने को मिलता हैं । इनके प्रेम का लक्ष्य नए संबंधों को निर्धारित करना हैं और नए संबंध बिना प्रेमभाव के कैसे निर्धारित हो ! ये वही व्यक्ति हैं जो संबंधों के प्रति बेहद ही संवेदनशील होते हैं ।
  • काल चक्र का अष्टम भाव रहस्यों का भाव हैं रहस्य हैं तो गुप्त हैं अज्ञात हैं । ऐसे व्यक्ति जिनके बारे में बेहद ही रहस्यमयी स्तिथि देखने को मिलती हैं जैसे की किसी विज्ञानिक , ज्योतिषी , संत , जासूस , इत्यादि जैसी जीवनशैली , ऐसे व्यक्तियो का प्रेम भौतिक स्तर पर निर्धारित नहीं होता वे रहस्यों के प्रति अपना निष्ठा व्यक्त करते हैं । ऐसे व्यक्ति के जीवन में एकाँकीपन देखने को मिलता है और इनका प्रेम भी एकांत प्रवास हेतु ही निर्धारित हैं ।  ये स्वयं से बातें करना पसंद करते हैं किन्तु , इनके प्रेम का उद्देश्य जग के कल्याण हेतु ही होता हैं । ये स्वयं से भौतिक सुखों के मामलों में दुखी होते हैं क्योंकि इन्हे भौतिक जगत के व्यक्ति कभी समझ ही नहीं पाते और तो और ऐसे व्यक्ति की परेशानियाँ भी अज्ञात लक्ष्य की और से निर्धारित होती हैं । ये रहस्यों से प्रेम करने वाले रहस्यमयी व्यक्ति में से गिने जाते हैं । जिनके वारे में कुछ भी कह पाना व समझ पाना भौतिक स्तर पर बेहद ही कठिन हैं ऐसे व्यक्ति मुख्य रूप से अपने कार्य के प्रति निष्ठावान होते हैं । जिसके लिए इन्हे समझ पाना भौतिक वादियों हेतु कठिन होता हैं । इनका प्रेम अज्ञात रूप से सभी के लिए निर्बद्ध रूप से निरंतर क्रियाशील रहता हैं । इसीलिए ऐसे व्यक्ति अपने प्रेम का प्रदर्शन अपने साथी के साथ भी कर पाने में अक्षम होते हैं । ऐसे व्यक्तियो का प्रेम भी अज्ञात ही रह जाता हैं । ये रहस्यवादी रहस्यों को सुलझाते सुलझाते ये अपने प्रेम को भी रहस्य ही बना लेते हैं ।
  • काल चक्र में नवम भाव धर्म का होता हैं देवताओ का होता हैं । ऐसे में नवम प्रकार का प्रेम धर्म के प्रति कर्तव्यों के प्रति दायित्वों के प्रति जागरूकता को दर्शाता हैं । व्यक्ति का प्रेम अपने दायित्वों और कर्तव्यों के प्रति संवेदनशील होता हैं । सनातन धर्म के माध्यम से होने वाले कर्म जो पूजा पद्धति में प्रायोगिक तौर पर स्थित हैं वे सभी के सभी कर्म सिद्धाँत पर आधारित हैं । जिसे सामान्य तौर पर भी देखा जा सकता हैं । ऐसे में व्यक्ति विशेष का धर्म सिर्फ एक ही होता हैं अपनी जिम्मेदारियों के प्रति कार्यशील होना । इनकी जिम्मेदारियाँ ही इनके प्रेम का प्रारूप होता हैं । ये धर्म न्याय कर्तव्य के आधार पर सभी से जो इनकी जिम्मेदारियाँ बन कर के इनके जीवन में आते हैं उनके प्रति इनका श्रद्धा भाव आत्मिक तौर पर उनके इर्द गिर्द रहता हैं । विशेष तौर पर ये पिता के भी भाव हैं न्याय नीति और पिता दुआरा निर्दिष्ट मार्ग से इनका लगाव होता हैं जिसके फलस्वरूप इनका अपने पिता के प्रति विशेष प्रेम देखने को मिलता हैं । इनके अंर्तचेतन मन में पिता की छवि रहती हैं पैतृक मार्गदर्शनों के प्रति इनका आत्मिक झुकाव इनका पिता के प्रति प्रेम को जाहीर करता हैं ।
  • काल चक्र में दशम भाव कार्य से संबंधित हैं ऐसे में व्यक्ति का दशम प्रेम कार्य ही होता हैं । पिता और कर्म का विशेष रूप से और धार्मिक दायित्वों की वाणी भी हैं ऐसे में व्यक्ति थोड़े से प्रायोगिक तौर पर प्रेम करते हैं । ये अपनी भावनाओ को व्यक्त करने में असमर्थ रहते हैं । जिसके कारण से इनकी थोड़ी सी घरेलू स्तर पर परेशानियों का सामना करना पड़ता हैं । उदाहरण के तौर पर जीतने भी बड़े बड़े माननीय सदस्य गण जो व्यापारी हो या कोई सेलिब्रिटी हो या बड़े बड़े राजनेता हो या फिर बड़े बड़े उद्योगपति इन सभी के जीवन में घरेलू स्तर पर प्रेम संबंधित मामलों को लेकर जो उदासीनता देखने को मिलती हैं वे सभी के सभी अपने कार्यों के प्रति अपने प्रेम को दर्शाते हैं । इन लोगों के मध्य का आपसी संबंध भी इतना प्रायोगिक होता हैं की उन्हे खुद पता नहीं चलता की वे प्रेम कर रहे हैं या फिर कोई सौदा । कुल मिलाकर के ऐसे व्यक्ति के जीवन में कार्यों के प्रति होने वाले समर्पण ही उनके प्रेम की परिभाषा हैं ।
  • कालचक्र में एकादश भाव आय का माना जाता हैं इक्षा के पूर्ति का साधन माना जाता हैं । ऐसे भाव में व्यक्ति का प्रेम भी इक्षाओ के पूर्ति पर ही आधारित हो जाता हैं । सिद्धाँत ये हैं की जैसे जैसे व्यक्ति की व्यक्तिगत इक्षाएँ पूर्ण होती जाती हैं और इक्षाओ के पूर्ति पश्चात जिस प्रकार से इक्षाएँ अपने रूप को बदल लेती हैं ठीक उसी प्रकार से व्यक्ति का यहाँ प्रेम भी बदलता हैं ऐसे योगों को मैंने उनलोगों की कुंडलियों में देखा हैं जिनके सप्तम भाव का स्वामी एकादश भाव में हो । ऐसे में व्यक्ति विवाह से पूर्व अपने जीवनसाथी से बेहद प्रेम करता हैं किन्तु , विवाह के उपरांत कुछ वर्षों के बाद उनका extra marital affair का खेल शुरू हो जाता हैं । ये मेरा कई जातिकाओ की कुंडली पर किया गया विश्लेषण भी हैं । जिनके पति ३ से ५ वर्षों में ही संतान उत्पत्ति के उपरांत भी दूसरी स्त्री के साथ संलिप्त हैं ।
  • काल चक्र का अंतिम भाव व्यय का भाव त्याग का भाव मुक्ति का भाव शांति का भाव होता हैं । जो व्यक्ति इनमे विश्वास रखता हैं वो भी किसी के समझ में नहीं आते इनका प्रेम शान्ति से होता हैं । इनका प्रेम भी बेहद रहस्यमयी होता हैं , जो किसी के समझ में नहीं आता । इनके प्रेम का आधार मुक्ति हैं इनकी श्रद्धा मुक्ति हैं इनका विश्वास मुक्ति हैं इनका लक्ष्य मुक्ति हैं । स्वतंत्र सिद्धांत पर इनका आंतरिक हृदय के भाव एक मात्र मुक्ति की और किया गया लक्ष्य इनके प्रेम की आधारशिला को निर्धारित करती हैं । कलिकालखंड में गौतम बुद्ध और स्वामी विवेकानंद इनके जैसे सभी ज्ञात अज्ञात व्यक्ति त्याग तपस्या की जीवंत व मृत मूर्त रूप इस तथ्य के विशेष परिचायक हैं । ये प्रेम की बात हैं जो ये सिखाता हैं की त्याग भी प्रेम का ही रूप है जैसे की किसी भी विवादित स्तिथि में अपनों से संघर्ष न करना । क्या अपने परिवार हेतु संघर्ष का त्याग कर देना क्या ये प्रेम की परिभाषा नहीं हैं ?

उपरोक्त सभी प्रकरणों को देखते हुए मैंने पूर्व में ही कहा की प्रेम के बिना इस सृष्टि की कल्पना करना गुनाह हैं ।

क्योंकि ,   प्रेम समर्पण हैं , आंतरिक भाव हैं,  अंर्तचेतना का जुड़ाव हैं , त्याग का रूप हैं , अपनी इक्षाओ के प्रति जागरूकता हैं , किसी और हेतु जीवन के हर एक पहलू पर खुद को समेट के रखना प्रेम हैं , प्रेम विश्वास हैं , निष्ठा हैं , कर्तव्यों का पालन हैं , दायित्वों का निर्वाहन है , स्वयं पर विश्वास करके किया गया संघर्ष हैं , किया गया मित्रता हैं , सहयोग हैं , साथ निभाने की जिद हैं ,  यही तो प्रेम हैं ।

शायद मेरी अल्प बुद्धि के कारण प्रेम रूपी यथार्थ को समुचित रूप में रखने में मैं असमर्थ रहा इसके लिए आप सभी से क्षमा प्रार्थी हूँ ।

ज्योतिषविज्ञ :- आर के मिश्र

BHAGALPUR ASTROLOGY & RESEARCH CENTRE


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